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Saturday, November 28, 2009

हेल्प! मैं घर में नज़रबंद हो गया हूँ.

आज  कल  मैं   नज़रबंद हो  गया  हूँ .घर  से  निकलना  बंद 


हो गया है . कहीं  भी  आ  जा  नहीं  पा  रहा  हूँ  .अगर  घर 


पे  कोई  आता है  भी तो  मुझे  अन्दर  कमरे  में  रहना 


पड़ता  है? जानते  हैं  क्यूँ ? एक  सवाल  के  कारण ! 

जी  हाँएक सवाल के कारण! घबराइए  नहीं सवाल ये  नहीं है कि


अकबर  का  बाप  कौन  था (जैसा  की KBC-4 के प्रोमो  में 


आजकल  पूछा   जा रहा है). वैसे  अकबर का बाप वाकई  में था


कौनजहाँ  जाओ  लोगों  के होठों  पर  बस  यही  सवाल होता 


है-----आज कल क्या  कर  रहे  हो बेटा ?”  


समझ  में नहीं आता की क्या जवाब  दूं  लोगों को ?

 इसलिए  जब  भी  कोई  मुझसे  ये  खतरनाक  सवाल  पूछता 


है  तो  बस  चेहरे  पे  एक  हल्की  मुस्कान  लिए  नज़रें 



झुकाता  हुआ  निकल  लेता  हूँ . अब  अगर  मेरी  शादी  की  


बात  कर  रहे  होते  तो मेरी इस  हरकत  पर  लोग  शरमा


गया , शरमा गया . लड़का  शरमा गया.कहकर  हँसते  हुए आगे  बढ़  जाते .


वेळ , मुस्कान तो अभी  भी लोगों  के  चेहरे पर देखने  को 


मिल  ही  जाती  है. पर ये मुस्कान कटाक्ष  वाली  होती  है . 


इग्नू  के  M.A. इन  जर्नलिज्म    कोर्स  में  एडमिशन  होने 


के  बाद  भी  उसमे  एडमिशन ना  लेने   के मेरे  निर्णय  के 


बाद(क्यूंकि मैं फिल्म एंड टेलीविजन इन्स्चीतीउट ऑफ इंडिया के 


स्क्रिप्ट राइटिंग वाले कोर्स में एक बार कोशिश करना चाहता था 


अगले साल और अगर मैं इग्नू वाले कोर्स में एडमिशन ले लेता तो 


ये संभव नहीं था.), तो ये मुस्कान और भी ज्यादा  कटीली  हो  गयी  है.

ऐसा  नहीं है की मेरे पास  कोई जवाब  नहीं है. पर वो  जवाब


लोगों के पल्ले  नहीं पड़ता .  


अब कोई कोर्स तो कर नहीं रहे हो.कम  से  कम  कोई छोटी 


जॉब  ही देख  लो . ऐसे  बेकार खाली  क्यूँ बैठे हुए हो ? कुछ कर


लो.”  कुछ  ऐसी  राय मुझे  मिला  करती .  पर क्या मतलब है


इस 'कुछ कर लो' और 'खाली क्यूँ बईठे हो' का?'. 


अब कल ही मेरे घर के सदस्य से किसी ने पुछा की भाई चन्दन


यानी की मैं क्या कर रहा हूँ आज कल. तो उनको जवाब मिला---


'कुछ नहीं'. अरे  भाई  बेकार  और खाली बैठे ही कौन  है यहाँ


 मुझे....मुझे  लोगों से जानना  है कि  बेकारऔर खाली  बैठना


का  क्या डेफिनेशन  है उनका ?   मैं रोज  अपनी  कम्युनिकेशन 


और राइटिंग स्किल  पर काम  कर रहा हूँ. फिर  एक नौवेल  भी


लिख  रहा हूँ.

 और जहाँ  तक  जॉब करने  की बात है तो वो मैं कहीं -कहीं 


अप्लाई  भी कर ही रहा हूँ. अब मैं तो सिर्फ  अप्लाई ही कर 


सकता  हूँ ना? और वैसे  भी क्या अपने  स्किल को अपग्रेड  


करना, अपने सपनों  को पाने  की दिशा  में काम करना बेकार 


खाली बैठनाकहलाता  है? 


क्यूँ हम ये नहीं समझते हैं की The process is as important and 


critical as the final result.
जॉब उसे पाने के लिए प्रयास करना;अपने स्किल्स में बढ़ोतरी करना वो 


प्रोसेस है जिससे मैं अभी गुजर रहा हूँ. और ऐसा भी नहीं है की 


मैं कोई पैसे वैसे नहीं कम रहा हूँ.जुलाई महीने तक मैंने एक 


डेवेलपमेंट एजेंसी में बतौर रिपोर्टर और राइटर काम किया है और 


उसके लिए अच्छे-खासे पैसे भी मिले मुझे.फिर क्या प्रॉब्लेम है 


लोगों को? मतलब  कहीं पर बंधुआ  मजदूर  की तरह   मुफ्त  में 


स्लेव की तरह  खटो या फिर कोई भी घटिया प्राइवेट कॉलेज से 


कोई मॅहगा  सा कोर्स कर लो  ये लोगों को मंजूर  है पर  अपने 


आप  में इन्वेस्ट  करो , अपनी कमियों  को दूर  करने में समय  


और मेहनत  लगाओ तो   वो  नागवार  है उन्हें ! आखिर  क्यूँ?

The process is as important and critical as the final result.


अब जब प्रोसेस में ही कमी  रहेगी  तो रिजल्ट कैसे  अचीव  हो 


पाएगा ? मैं नहीं जानता की जिस तरह और जिन चीजों में मैं 


अभी टाइम खर्च कर रहा हूँ, उसका क्या फिउचर  है. पता नहीं की 


कभी मेरी नॉवेल छप पाएगी भी या नहीं? जिसे मैं अपनी स्किल्स 


में इम्प्रूवमेंट समझ रहा हूँ वो वाकई में इम्प्रूवमेंट है या सिर्फ मेरा 


भ्रम या ग़लतफहमी.मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि मैं समय बर्बाद 


नहीं कर रहा है.  पर एक-एक को पकड़  कर  ये बातें कौन  


समझाए ?


इसलिए  काफी  चिंतन  करने  के  बाद  मैं  इस  निष्कर्ष  पर  


पहुंचा  हूँ  कि अब  से  जो  भी  मुझे  ये  सवाल  करेगा कि    
बेटा  आजकल  क्या  कर  रहे  हो ?” तो  मैं उनसे  कहूंगा  की  
अंकल  बस  श्री  कृष्ण  के कहे  रास्ते  पर चल  रहा  हूँ---- 


कर्म  किये जा  रहा हूँ फल  की चिंता  किये बगैर .”. क्यूँ  सही  


जवाब  सोचा  है  ना ?

लेकिन इसमे एक छोटा सा लोच है.


अब कल  को  ही  एक बुजुर्ग  ने  मुझे वो  सवाल कर डाला . 


अब उनको  श्री कृष्णवाला  जवाब देता  तो थोडा  रुड  नहीं  


लगता ? इसलिए मैंने  उनसे कहा  ----कुछ  नहीं दद्दू  बस कल 


को आपके  घर  मिठाई  लाने  की तैयारी  चल रही  है.”.

मिठाई? क्यूँ बेटा?”. उन्होंने  पूछा .


जी  वो नया  घर और  नयी  गाडी  खरीदने  की ख़ुशी  में .मैंने जवाब दिया .


गाडी? घर? वो कब  खरीदा ?” उन्होने  आश्चर्यचकित  होते  हुए  पूछा .


खरीदा नहीं कल को खरीदूंगा .मैंने स्पष्ट  किया .


उनके  चेहरे  पर प्रश्न  ही प्रश्न उभर  आये .


मैंने कहा, “मैं समझाता  हूँ. पहले ये बताइये आप कि मिठाई क्यूँ आपके यहाँ  लाने वाला हूँ?”


घर और गाड़ी खरीदने की ख़ुशी में.उन्होने कहा.


करेक्ट .और गाडी और घर कब खरीदी  जा सकती है?”


अच्छी जॉब लगने पर.


और अच्छी जॉब कैसे लगेगी?” मैंने फिर एक सवाल दागते हुए पूछा.


मेहनत और लगन  से.उन्होने कहा.


बिलकुल सही. सो  आजकल वही  कर रहा हूँ-- मेहनत .मैंने कन्क्लूड  करते  हुए कहा.


वैसे  पता  नहीं इस घटना  का  इस बात  से कोई  लेना  देना  


है की नहीं पर कल ही मैंने सुना  की उनका  अचानक  से BP  


बहुत  हाई  हो गया  और उन्हें   में  भर्ती  करना  पड़ा .


.भगवान् उनकी रक्षा करे.


 बहरहाल , चलो  मेरी  प्रॉब्लम  तो सौल्व  हो गयी! लेकिन  


अगर  यही  सवाल  किसी  ने  मेरे  घरवालों  से  कर  दिया तो  
? अब वो तो नहीं कह  सकते  ना कि  श्री कृष्ण  के  कहे  


रास्ते  पे  चलते  हुए  बस  सिर्फ  कर्म  किये  जा  रहा  है  


हमारा  आज  का  अर्जुन ’.” या  फिर  आपके  घर  कल  


कोमिठाई  लाने  की  तैयारी  में  जुटा  है”.


तो, भैया उनके लिए कौन सा पौलीतिकली करेक्ट जवाब सोचूं. 


हाँ , याद  आया ! 

दशकों  पहले मैंने इग्नू  के डिप्लोमा  इन  क्रिएटिव  राइटिंग  


वाले  कोर्स  में एडमिशन  लिया  था  जिसे  आज तक  मैं पूरा  


नहीं कर पाया  हूँ. अभी  भी मेरे पास  एक और साल का  


टाइम बचा  है  पूरा  करने  को . हाँ  ये  बढियां  रहेगा . 


उनके ये  जवाब  देने  पर  कि   मैं  कोई  कोर्स  कर  रहा  


हूँ लोगों को  भी  चैन   हो जाएंगे  कि  चलो लड़का  खाली  


बेकार नहीं बैठा   है’ 'कुछ कर रहा है'. और मुझे  हीन  दृष्टि  से  


भी  नहीं  देखेंगे .
तो चलो भाई  ये फाइनल  हुआ . अब जब  भी मुझसे  ये कठिन  सवाल  पूछा जाएगा  तो आप ये जवाब सुनने  के लिए तैयार  रहिएगा -----

•     “बस श्री कृष्ण के कहे रास्ते पर चल रहा हूँ------ सिर्फ कर्म कर रहा हूँ फल की चिंता किये बगैर.

•     “आपके घर कल को मिठाई लाने की तैयारी में जुटा हूँ.

•     इग्नू से डिप्लोमा इन क्रिएटिव राइटिंग का कोर्स कर रहा हूँ.



अब  इन तीनों  में से जो  जवाब  पसंद  हो और जो  मेरे 


सबसे  कम बत्तिमिजी या काबिल बनने  जैसी  फीलिंग  देता हो, वो जवाब आप सेलेक्ट  कर लो .
ठीक  है जी? अच्छा  फिर चलता  हूँ. 


कर्मकरने  का टाइम  हो चला  है.


मिलता  हूँ फिर बाद में.


जय  श्री कृष्ण!


Friday, May 1, 2009

An epitaph of myself---'मेरी मौत पर लिखा गया एक स्मरण लेख'

गीता में कहा गया है की जहाँ अच्छाई होती है वहाँ बुराई भी होती है. यानी जहाँ जहाँ एक कृष्ण होता है वहां वहां एक कंस मामा का होना भी अवश्यम्भावी है. ऐसे ही एक कंस का प्रतिक थे चन्दन जो अब हमारे बीच नहीं रहे. चन्दन जी को अगर एक शब्द में बयान करना हो तो वो शब्द होगा 'अलग'.


चन्दन वाकई में बहुत ही अलग थे. अभी मैंने उनकी तुलना कंस से की. पर उस कंस और इस कलियुगी कंस में उतना ही अंतर है जितना की लालू जी का चुनाव से पहले कॉंग्रेस के साथ रिश्ता और चुनाव के बाद का रिश्ता. यानी की टोटल कॉन्ट्रास्ट.


चन्दन जी ओरिजिनल कंस की तरह किसी के मामा तो नहीं थे पर हाँ अपने जीवनकाल में कई लोगों को उन्होने अपनी चारसौबीसी नेचर के कारण 'मामा' जरूर बनाया. दूसरा अंतर ये है की इन्होने ओरिजिनल कंस की तरह देवकी के सात शिशुओँ का वध तो नहीं किया पर सात बच्चों के पिता बनकर ओरिजिनल कंस के कारनामों की भरपाई जरूर करने की कोशिश की.


अपने जीवनकाल में चन्दन जी नि ये सफल कोशिश की इनके किसी भी चिर-परिचित से मुस्कान ऐसे गायब हो जैसे की IPL kii KKR team के मालिक शाह रुख खान के चेहरे से हंसी और ज़िन्दगी से ख़ुशी गायब हो गयी हो.


आज चन्दन जी हमारे बीच नहीं हैं. इनके जाने से आंसुओँ की धारा बह निकली है सभी आंखों से.इसे देखते हुए 'opportunist' THIRD FRONT ने हमेशा की तरह डांस पे चांस मारा और चन्दन जी के घर के बाहर make-shift tissue paper की एक दूकान लगा कर बैठ गए हैं. भगवान् भला करे ऐसा 'मौकापरस्तों' का.
आज हर जगह recession, slowdown मंदी की चर्चा जोरों पर है. पर ये तो पिछले १०-१२ महीनों में ही ऐसा हर जगह देखने-सुनने को मिल रहा है. चन्दन जी की फेमिली तो पिछले कई सालों से cost-cutting, recession, मंदी जैसे चीजों से दो-चार होती आ रही हैं चन्दन जी की कंजूस प्रवित्ति के कारण.
पर आज चन्दन जी ने अपनी मौत से मंदी के भूत को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया ठीक उसी तरह जिस तरह IPL को साउथ-अफ्रीका का रास्ता दिखाया गया था। पर चलो मंदी के भूत से पिंड तो छुटा.
क्या हुआ की अभी इसकी beneficiary सिर्फ उनकी फेमिली हो होगी. किसी को तो अब मंदी के मार नहीं झेलनी पड़ेगी और वे अब खुल के अपनी चाहतें पूरी कर सकेंगे.


भगवान् चन्दन जी की आत्मा को शान्ति,कमला,पूजा,ऋतू,श्रेया, रितिका और जिसे भी वोह अपने जीवनकाल में चाहते थे, वो इनको मिले.

Thursday, April 30, 2009

A TV AD ON THE ELECTION THEME

[scene: एक मिडिल-एज आदमी(मिस्टर मेहता)अपने घर की रिपेयर, रंगाई-पुताई करवा रहा होता है।)]। (This is an ad written n conceptualised by me and is an original work)

VO1 : क्यूँ मेहता साहब किसकी सरकार बनती देख रहे हैं इस बार? इस बार आपका वोट किसे पडेगा?

VO 2(Mr। Mehta): अरे भाई किसे फुर्सत है? अभी घर में काम लगा रखा है। वोटिंग के लिए जा पाना मुश्किल है।

VO1 : अरे मेहता साहब ज्यादा से ज्यादा आधा दिन लगेगा। कुछ घंटे का समय निकाल के चल जाइयेगा वोटिंग करने।

VO 2(Mr। Mehta):कुछ घंटे? अरे यहाँ तो पांच-मिनट की फुर्सत नहीं है। अब अपने घर का काम है। लगे रहना पड़ता है। वरना थोडी सी भी ढिलाई देने का मतलब हजारों का खर्चा और। यहाँ तोह सर पर सवार होकर काम करवाना पड़ता है।

VO1 : अरे तो उतनी देर के लिए किसी और को काम देखने पर लगा दीजिये और आप वोट दे आइये।

VO 2(Mr। Mehta): क्या बात कर रहे हैं भाई? मेरा मकान है तो जवाबदेही भी मेरी ही बनती है इसके देख-रेख की।इस बात की क्या गारंटी है की दूसरा उतने ही sincerity से ये काम देखेगा जितनी sincerity से मैं देखता हूँ। ऐसे कैसे मैं किसी भी के हाथों में अपने घर को सौंप दूँ? अपने घर के मामले में मैं ऐसी लापरवाही नहीं बरत सकता।

VO 1: मेहता जी देश भी तो अपना ही है और इसके देख-रेख की भी तो जिम्मेदारी हमारी ही है। ऐसे कैसे किसी के भी हाथों हम अपने देश को सौंप सकते हैं? अगर हम नहीं सोचंगे तो और कौन सोचेगा।

BACKGROUND VOICE OVER: जब कुछ घंटों के लिए हम अपना घर किसी और के हवाले नहीं कर सकते तो कैसे अपने देश को बिना सोचे-समझे किसी के भी हवाले कर सकते हैं? वोटिंग करने जरूर जाएं तो एक अच्छे और सच्चे नेता को चुन कर अपने देश को भी सुन्दर और मजबूत नींव प्रदान करें।
DO VOTE

An election-theme based Television commercial

(scene: A marriage scene at the bridegroom's place where preparations are in full swing for the marriage due to take place in 4 days' time. A guest arrives and the father of the bridegroom welcome him. After exchange of greetings, they sit down for a quick chat.)
SFX:( sounds of marriage songs playing in the backgroud)
(This is an ad written n conceptualised by me and is an original work)
V।O।1(the guest): बेटे की शादी मुबारक हो वर्मा जी।

VO2(Mr। Verma): बहुत-बहुत शुक्रिया। आइये अन्दर बैठिये। मैं थोडा ऊपर की सजावट देख कर आता हूँ।

VO1(the guest): अरे वर्मा जी। थोडा बैठिये तो सही। इस उम्र में कितनी भाग-दौड़ करिएगा?

VO 2(Mr। Verma) : अरे भाग -दौड़ कैसी? भाई एकलौते बेटे की शादी है। कहीं कोई कसर नहीं रह जाए।
(as the above two people are talking Mr। Verma's brother--the bridegroom's uncle comes and shows the list of refreshments that is to be served to the bride's guests coming for the reception।)



VO2 ( Mr.Verma): अरे सिर्फ कोल्ड-ड्रिंक ही क्यूँ लिस्ट में इनक्लूड है? २-३ fruit juice के आइटम्स भी बढा दो. गर्मी का मौसम है भाई. देखो ये मौका बार बार नहीं आने वाला. कहीं कोई कमी या कंजूसी नहीं होनी चाहिए.)

V।O।1 (the guest): ये सब तो ठीक है वर्मा जी. पर इस बार किसे वोट देकर जीता रहे हैं आप?

VO2 (Mr। Verma): अरे क्या वोट दिया जाए? कुछ होने जाने वाला नहीं है.वैसे भी शादी के दो दिन पहले वोटिंग है. फुर्सत किसको है यहाँ? वैसे भी शादी के चक्कर में पिछले एक महीने से इतनी भाग-दौड़ की है की पूछो नहीं आप. इसलिए शादी के दस दिन बाद तक मैं घर से कहीं नहीं निकलने वाला. अब एक वोट नहीं पडेगा तो कौन सा पहाड़ टूट पडेगा? वैसे भी बेटा तो मेरा एक ही है. अब बार बार तो इसकी शादी नहीं होनी वाली. एकलौते बेटे की शादी है. इसलिए सब कुछ का ख़याल मुझे ही तो रखना है. कही थोडी सी भी चूक नहीं होनी चाहिए.

V।O.1 (the guest): वर्मा जी देश भी तो एकलौता ही है. उसका थोडा भी खयाल नहीं रखियेगा?देश की भी जिम्मेवारी तो हमारी ही बनती है.

(a background voice over: वोटिंग जरूर करे।
Don't take it as a burden. Take it as duty and do perform your duty. Our nation is our responsibility.)

Saturday, April 25, 2009

A Funny Love Application


To,


My Beauty(with or without brain, preferably without brain);


Daughter of a rich man;


Residing anywhere in Metros or Abraod(preferably abroad)




Dear Jaanu,


Sub: Applying for the job of becoming your ‘Saawariya’
यूँ तो प्यार नजरों की भाषा होती है पर मुझे conjectivitis होने और तुम्हारे भेंगे होने के कारण मुझे शब्दों का सहारा लेना पड़ रहा है.
Unlike innumerable road-side Romeos, मैं तेरे लिए चाँद -तारे तोड़ कर तेरे कदमों में रखने का दावा नही करता । ऐसा नही है की मैं चाँद -वांड तोड़ कर तुम्हारे कदमों में नही रख सकता . पर अगर चाँद तोड़ कर तेरे कदमों में रख दिया तो फ़िर इतना खर्चा कर के जो चंद्रयान -1 को चाँद पर भेजा गया है , उसका क्या होगा ? सो देश -हित में ऐसा कुछ नही करूँगा .


All I offer you is my love as मेरी सारी दौलत लालू जी के कारण डूब गई । वो क्या हुआ की मैंने लालू जी के LOK SHABHA चुनाव 2009 में CONGRESS का साथ देने par सत्ता (bet) लगाया था पर LALU जी ने सब मटिया पुलित कर दी .


However, even in this recession period, I assure you that I won’t cut corners on the budget of your Kitty parties, make-up kits and travel tours। With me, there won’t be any chance of domestic violence either as I suffer from itching problems and half the day is spent scratching and scrubbing my body.So You will be the KINGG…err…. I mean to say QUEEN.


Hope to become your Saawariya,


Yours truly(till you don’t reject me)
Saawariya

Friday, April 24, 2009

कल्चर ऑफ़ साएलेंस



कल्चर ऑफ़ साएलेंस
कल्चर--- आखिर क्या है ये शब्द सो बचपन से मैं सुनता आया हूँ. जहाँ तक मेरी समझ मुझे ले जाती है और जिंदगी ने जितना अनुभव मुझे दिया है, उस लिहाज से संस्कृति या कल्चर का अर्थ मेरे लिए यही है कि किस प्रकार हम अपनी निजी और सामजिक जिंदगी जीते हैं. जिस तरह हम खुद को प्रेजेंट करते हैं दुनिया के सामने उसी को ये दुनिया हमारी संस्कृति का नाम देती है कि भाई ये लड़का बड़ा संस्कारी मालूम पड़ता है या फिर इस लड़के को तो लगता है कि इसके माँ-बाप से कभी कोई संस्कार दिए ही नहीं, वगैरह वगैरह.कल्चर का अर्थ सिर्फ वो रिवाज या संस्कार नहीं जो हम सदियों से निभाते चले आ रहे हैं.यहाँ जिस संस्कृति कि बात मैं कर रहा हूँ वो है "कल्चर ऑफ़ साईलेंस"-- "चुप्पी कि संस्कृति".वो संस्कृति जो पिछले कुछ समय से बड़ी तेजी से मेरी जिंदगी में अपने पाँव पसारे जा रही है.असल में ये 'चुप्पी कि संस्कृति' ओने आस-पास हो रहे गलत और unethical कार्यों को देखने के बाद भी अपनी आवाज़ नहीं उठाना है.क्यूँ हम उसे चुपचाप होने देते हैं चाहे वो कितना ही गलत क्यूँ ना हो? क्यूँ हम आगे बढ़ कर उन्हें वो गलत और अनैतिक कार्य करने से रोकते नहीं हैं? माना कि लोगों कि मानसिकता बदलना आसन नहीं पर हम पहल भी तो नहीं करते उन्हें वैसा करने से रोकने कि.मैं जब भी ऐसा कुछ करने कि कोशिश करता हूँ तो यही सुनने को मिलता है -" छोडो जाने दो। तुम्हे क्या प्रॉब्लम हो रही है. जैसा वो कर रहा है करने दो उसे. तुम क्यूँ टेंशन लेते हो. तुम बस अपने आप से मतलब रखो. दूसरा जो कर रहा है उससे करने दो."अब चाहे वो कॉलेज में मेरे कुछ क्लासमेट्स द्बारा क्लास नहीं आने पर भी अपना अटेंडेंस खुद बना लेना हो या फिर पासपोर्ट वेरिफिकेशन के लिए आये अधिकारी का वेरिफिकेशन की प्रकिरिया पूरी करने के लिए "खर्चे-पानी" की 'गुजारिश', हर जगह हर बार चुप्पी की संस्कृति अपनाने की सलाह दी जाती है. तर्क ये दिया जाता है कि जल में रह कर मगरमच्छ से बैर नहीं रखते. ये बिहार है यहाँ कुछ नहीं बदलने वाला. आखिर अकेला चना कभी भांर फोड़ सकता है भला?ये चुप्पी की संस्कृति मुझे आये दिन परेशान करती है।
I FEEL SO HELPLESS AT TIMES।पर जैसा चल रहा है उससे देख कर तो यही लगता है कि मुझे भी चाहे-अनचाहे इस चुप्पी की संस्कृति के आगे घुटने टेक देने होंगे और उसे अपनाना ही होगा. पर ये शर्मिंदगी मुझे जिंदगी भर कचोटती रहेगी कि मैंने हार कर इस 'चुप्पी की संस्कृति' को अपनाया था. नहीं ला सका मैं कोई बदलाव इस दुनिया में. इतनी हिम्मत नहीं दिखा सका कि अपने अधिकारों के लिए, सच के लिए खडा हो सकूँ.यही संस्कृति मुझे अपने समाज से अपनी पहले वाली पीढी से मिली है और शायद यही में आने वाली पीढी को दूंगा. पर मुझे हमेशा उस श्रोत का इंतज़ार रहेगा जो इस चुप्पी कि संस्कृति को तोडेगा और हमें अपने हक़ के लिए,सच के लिए खड़े होने कि हिम्मत देगा. मुझे उसका इंतज़ार रहेगा!!!!!!

Wednesday, March 11, 2009

Radio ad script(a teaser& the subsequent main radio ad) for a songs-on-public-demand show

(The ads have been conceptualised by me and are original work)

Teaser script 1
Teaser script 1: for the phone-in demand show Pataniya demand)Duration: 39 seconds
Script:

Voice OVER of SUNNY DEOL: तारीख पे तारीख ….. तारीक पे तारीख ….मिली तो सिर्फ तारीख …..इन्साफ नहीं मिला जज साहब


Voice OVER2: अरे…… -रे-रे .जज साहब ने तो अपने सन्नी पाजी की डिमांड ना मान कर उन्हें तोह कर दिया नाराज़ . पर आपकी हर फरमाइश (demand) को करेगा Radio Mirchi 98.3 FM पूरा . कैसे ? क्या ? कब ? ये जानने के लिए करना पड़ेगा आपको ……………


SFX: (a line of the song “intezaar” from John Abraham-starrer ‘PAAP’ plays)
Voice OVER2: तो सुनते रहिये Radio Mirchi 98।3 FM॥ It’s hot!

Main radio ad for RADIO MIRCHI’s SHOW ‘PATNAIYA DEMAND’

Main radio AD SCRIPT for RADIO MIRCHI’s SHOW ‘PATNAIYA DEMAND’

Voice 1: sir please sir 1 marks देकर मुझे पास कर दीजिये sir
Voice 2: NO
Voice 1: please sir मुझे पास कर दीजिये .
Voice 2: NO
Voice 1: sir दिखने लगे हैं मुझे आपमें ब्रह्मा ,विष्णु और महेश

जबसे आपने कहा है की मेरा result है ‘pending’ केस ।

ऐसा जुल्म मेरे पे ना DHAAIYE

अपनी girlfriend और दोस्तों को ‘दीदी ’, ‘भैया ’ कहने से मुझे बचाइये ।


Voice 3: अब हमारे पप्पू भैया लगाकर बैठे हैं आस

क्या 1 marks देकर teacher जी करेंगे इन्हें पास ?

अब भाई पप्पू भैया की demand पूरी होगी या नहीं ये तोह पता नहीं । पर Radio Mirchi पर हम करेंगे आपकी तमाम demands और फरमाइश पूरी ---अरे भैया marks की नहीं बल्कि नए नए फ़िल्मी गानों की ।

तो दोस्तों , यारों से नए फ़िल्मी गानों के cassette/CD की बंद करो करनी मांग

क्यूंकि गानों का हिट शो आ चुका है --- पटनिया डिमांड


पटनिया डिमांड--- हर Saturday-Sunday रात 9-11 सिर्फ Radio Mirchi 98.3 FM par---It’s hot