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Tuesday, September 28, 2010

चुनावी बायो-डाटा



बिहार विधान सभा चुनाव में टिकट प्राप्ति हेतु सभी पार्टियों को लिखा गया मेरा पत्र

Friday, August 27, 2010

सक्सेस के बदलते फंडे

(सफल होने के नुस्खे)*


(* कृपया ध्यान दें---सफल होने के लिए जरूरी चीजों की ये लिस्ट पूरी नहीं है. इसमे कुछ और नाम/नुस्खे जुड़ सकते हैं.)


हार्ड वर्क इज दी की टू सक्सेस .”


“अगर सफल बनने की चाहत रखते हो तो मेहनत से जी नहीं चुराना होगा .”


“कठिन परिश्रम से ही सफलता आपके कदम चूमेगी.”


“मेहनत ही सफलता की कुंजी है .”


बचपन से ही अक्सर इन वाक्यों से सामना हो जाया करता था . बड़ों और टीचरों को अक्सर इस तरह की बातें करते सुनता था . सोचता था चलो भाई सफल होने के लिए इतना तो कर ही सकता था . बस मेहनत ही तो एकमात्र शर्त थी सफल होने के लिए . पर जैसे जैसे बड़ा होता गया ये लिस्ट लम्बी होती चली गयी --- अनुशासन , संकल्प , आत्मविश्वास , त्याग , समर्पण , धैर्य ……………


बाप रे बाप ! मैं तो डर गया . ये लिस्ट तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी . कहाँ सिर्फ मेहनत ही काफी बताई जा रही थी सफल बनने के लिए वहां इतने सारे नाम और जुड़ गए थे . खैर , चलो यहाँ तक तो ठीक था . मेहनत के साथ -साथ इन चीजों का भी बंदोबस्त किया जा सकता था . सफलता पाने के लिए इतनी कीमत तो चुकाई ही जा सकती है .उसमे कोई हर्ज़ नहीं . पर हाल के समय में सफल होने के लिए जरूरी चीजों की लिस्ट में जो नाम जुडे हैं , उससे मैं कनफिउज्फ़ हो गया हूँ .वो नाम हैं ----चापलूसी , सोर्स और पैरवी , कॉन्टेक्ट्स , जीहजूरी और न जाने क्या -क्या !


जहाँ तक मेरी बात है तो मैं स्क्रिप्ट राइटिंग के फिल्ड में करियर बनाना चाहता हूँ . और इसके लिए मुझे जितनी मेहनत करनी पड़े मुझे मंजूर है .पर और सब चीज़ें मुझसे होना थोडा मुश्किल लगता है . रही बात कॉन्टेक्ट्स की तो वो मेरे पास नहीं है . अब इसमे मैं क्या कर सकता हूँ ? अब एक अच्छी कहानी ,स्क्रिप्ट लिखने पर अपना सारा फोकस रखूं या फिर दूसरों से फ़रियाद करता हुआ नेटवर्किंग बनाने में ही अपनी सारी एनर्जी झोंक दूँ ?




यहाँ ऐसा न समझा जाए की मैं नेटवर्किंग के खिलाफ हूँ . मैं बस पूरी तरह से किसी और के भरोसे और रहमो -करम पे रहने के खिलाफ हूँ . और वैसे भी आज के जमाने में कौन किसी के लिए कुछ करता है . मेरा मानना है की टैलेंट अपना रास्ता खुद खोज लेगी और उसे सोर्स और पैरवी , कॉन्टेक्ट्स आदि का मोहताज रहने की जरूरत नहीं . They will take care of themselves. 


बस अपना काम पूरी शिद्दत और ईमानदारी से करो . टेलेंट के कद्रदान खुद -बा-खुद किसी न किसी रास्ते आपके पास पहुँच जाएंगे . क्या मेरी ये सोच गलत है ? क्या अपनी काबिलियत और मेहनत पर मेरा भरोसा काफी नहीं?
क्या इस तरह की विचारधारा रखकर मैं अपने आप को एक बडे निराशा और असफलता की ओर धकेल रहा हूँ ?




“ प्रेक्टिकल बनो प्रेक्टिकल . ऐसी आदर्शवादी सोच बस तुम्हारी ब्लॉग डायरी तक ही
सीमित रहे तो बेहतर होगा तुम्हारे लिए . अपने इगो , आत्मसम्मान को गंगा नदी में बहा कर ही प्रोफेशनल दुनिया में कदम रखो तो सही होगा . वैसे भी तुमने मीडिया की लाइन चुनी है उसमे सिर्फ टैलेंट होने या मेहनत से कोई गुजारा नहीं होने वाला . अपनी इस सोच को पीछे छोड़ दो नहीं तो खुद काफी पीछे छुट जाओगे .


मीडिया के फिल्ड में अगर पैर ज़माना है तो चापलूसी , काम निकलवाने  की कला , जीहजूरी ,पहुँच और मोटी चमरी वाला होना पड़ेगा . नहीं तो इसके बिना गुजारा नहीं . अगर यही आदर्शवादी रवैया रहा तो कल को कोई और बाजी मार ले जाएंगे और तुम अपने इन एथिक्स का ढोल पीटते रह जाओगे. Get real and practical."   एक ‘अनुभवी ’ और ‘दुनियादार ’ इंसान ने ‘रिएल्टी ’ का फर्स्ट -हैंड अनुभव बताते हुए मशवरा दिया .




बहुत जल्द इस ‘प्रेक्टिकल ’ दुनिया से मैं दो -चार होने वाला हूँ . मालूम नहीं कैसे सरवाइव कर पाऊंगा . क्यूंकि इस ‘प्रेक्टिकल ’ वर्ल्ड में सफल होने के जो पैमाने तय रखे गए हैं , वो ‘गुण ’ मेरे mein अभी तक नहीं आ सके हैं . अपने पैशन ,मेहनत , लेखन कौशल ,खुद पर यकीं पर ही पूरी तरह निर्भर होकर मैं अपने करियर की शुरुआत करने जा रहा हूँ . 1-2 दिनों में मुझे एक न्यूज़ चैनल में interview के लिए जाना है और हो सकता है की मेरे करियर की शुरुआत यहीं से हो . खैर , अब रात के 2 बज चुके हैं . अपना ये ब्लॉग मैं यहीं पर ख़त्म करता हूँ . देखते हैं की ये ‘प्रेक्टिकल ’ दुनिया मुझे अपने अनुसार ढाल देती है या मेरी इस सोच की जीत होती है कि मेरा टैलंट और मेहनत मेरा बेडा पार लगा देगी.


“अरे ये लड़का कब सुधरेगा ? आठ बज गए हैं पर अभी तक चादर तान सोये हुआ है . दिन चढ़ आया है फिर भी इस घर के लोग सोये रहते हैं . इसलिए हमारे घर में बरकत (तरक्की ) नहीं हो रही है . दस साल पहले जहाँ थे आज भी वहीँ है . दस साल से श्रीवास्तव जी हमारे यहाँ रेंटर है पर आज उनके यहाँ क्या नहीं है ? कल तो उन्होने नया एसी भी लगवा लिया और अपने यहाँ कूलर तक नदारद है ………………….” मुझे खरी -खोटी सुनाते हुए माँ बोली .


झट से मेरी आँख खुल गयी . 

माँ के तानों के कारण नहीं बल्कि इस वजह से कि सफल होने के लिए जरूरी चीजों की लिस्ट में आज एक और नाम /नुस्खा जुड़ गया था -----सुबह जल्दी उठना !


….

Sunday, August 1, 2010

A Letter to My Friend

Dear Friend,


सच्ची दोस्ती का रिश्ता अल्फाजों का मोहताज नहीं होता. वोह तोह बस एक एहसास है जो नजरों ही नजरों में अपनी बात कह जाता है. पर मुझे कन्जेकतीवाइटिस और तुम्हारे भैंगे होने के कारण मुझे शब्दों का सहारा लेना पड़ रहा है.


फिल्मों में देखा-सुना था कि दोस्ती में " नो सौरी नो थैंक य़ू ". पर तुम्हारी दोस्ती ने लोगों से बस यही दो शब्द मुझे नसीब करवाए.


"सौरी"---जो मुझे लोगों को तुम्हारी करतूतों के कारण बोलना पड़ता था और "थैंक य़ू "जो लोग मुझे तुम्हारे लिए हुए क़र्ज़ और उधार के सामान उन्हें वापस लौटाने पर बोलते थे.


पर इन सब के बाद भी मैं तुम जैसा सच्चा दोस्त पाकर खुश हूँ . मैं तुम्हे बेहद पसंद करता हूँ ( नो ‘दोस्ताना ’ एंगल हिअर प्लीज़ !) क्यूंकि तुमने मुझे खुद को पसंद करना सिखाया . अगर तुम ना होते तो मुझे कभी नहीं पता चलता कि ‘माल्व्रो ’, ‘गोल्ड फ्लेक ’ और ‘क्लासिक ’ से ज्यादा पैसा वसूल विकल्प है(ये सभी सिगरेट ब्रांड्स हैं) . मेरी दुनिया तो ‘बैगपाइपर ’ और ‘हेवार्ड 5000’ तक ही सीमित होकर रह जाती अगर तुमने ‘किंगफिशर ’ और ‘थंडरवोल्ट ’ से मेरी पहचान नहीं कराई होती(ये सभी शराब के प्रोडक्ट्स हैं) !


तुमने मेरे लिए क्या क्या नहीं किया है ! अगर सबकी गिनती करवाने लग जाऊं तो इतने साल निकल जाएंगे जितने साल “क्यूंकि सास भी कभी बहू थी ” भी न टेलीकास्ट हुई होगी ! किस मुंह से तुम्हारा शुक्रीया अदा करूँ ? जो मुह मेरे पास है वो तो तुहारी वजह से अपने मम्मी -पापा से थप्पर खाते -खाते सूज गया है . इसलिए इस लेटर का सहारा ले रहा हूँ.




उम्मीद है जहाँ भी तुम रहो वहाँ के लोग सही -सलामत रहे .


तुम्हारा दोस्त


चन्दन

Monday, November 30, 2009

10 things I’d do if the world comes to an end in 2012: 'File a case against my parents!'

(DISCLAIMER: This is a work of fiction meant for the purpose of entertainment. All the points mentioned below are fictitious, except point number 5 & 9, and mean no harm or disgrace to anyone.It doesn't intend to demean or embarrass any individual or community.All names used in the write-up bear no resemblance to anyone.
HAPPY READING!)


1. I would file a case against my parents for giving me four less years to live as they were married in 1983 but I, despite being the elder of their two children, was brought into this world not before 1988. Why?


2. I would try to clear my "C++" paper and get my BCA degree from IGNOU which I've failed to do so even though I've been pursuing the course for the past four years. So, If I don't clear my compartment papers by 2011, I would die an 'Undergraduate'. and if there's life after death, my market value (read marriage dowry) would suffer very badly thanks to my "undergraduate" status.


3. I would like to leave this world as an MBBS (Miya Biwi Bachcha Samet), before the world ends in 2012.


4. Before the world comes to an end in 2012, I would like to make this confession to my friend Abhishek in the form of this poem:


A boy must be at least 21 to get married is what says the law
But at 17 only, I used to fall for every girl I saw.


The one who fell prey to this was Abhishek--my closest pal
As I developed a huge crush on his gal (girlfriend).


I subscribed to the theory that everything is fair in love and war
It was decided if I didn't get her, I would take it as "grapes are sour".


By grace of God I got the opportunity soon
All that was needed a masterstroke that would see me on top of the moon.


It was Abhi's gal's birthday in the month of January
so,on her b'day, I was with Abhishek buying an expernsive card and a Blackberry.


As he went for some time to the loo
I had decided what I had to do.


I opened the card and wrote an encircled "A" on top of her name
As only adult movies have the encircled "A" attached to them, I was sure it would embarrass her and put her to shame.


My plan paid off as soon after they parted ways
Finally I got her and couldn't help but grin at the sight of some happy days.


5. Earn back the articles/commodities we lost in the robbery that took place at my house in 2007. (ie earning the amount equal to monetary value of the lost belongings).


6. Time my bank loans such that the time to pay back the loans falls after Decemeber 21, 2012.


7. Profess my love to my childhood love and be alongside her during the last moments.


8. Write my dream script and make a movie with Aamir Khan playing the lead. No, wait a moment. Aamir takes too much time agreeing to do a film. I'll have some other actor playing the lead.


9. My family has been abandoning plans to celebrate the Chhath festival in our native village located on the outskirts of Bihar for the past few years due to the despicable public transport conditions between Patna (the place where we live now) to my native village and celebrating it in Patna itself. So, I would like to buy a big car and take my family to my native village to celebrate Chhath Puja giving them a complete hassle-free and luxurious travel experience.


10. Send a 'Thank You' card to everyone who helped me compiling this list of ''10 things I'd like to do before the world ends in 2012" and allowing me to pass it as my own work

Saturday, November 28, 2009

हेल्प! मैं घर में नज़रबंद हो गया हूँ.

आज  कल  मैं   नज़रबंद हो  गया  हूँ .घर  से  निकलना  बंद 


हो गया है . कहीं  भी  आ  जा  नहीं  पा  रहा  हूँ  .अगर  घर 


पे  कोई  आता है  भी तो  मुझे  अन्दर  कमरे  में  रहना 


पड़ता  है? जानते  हैं  क्यूँ ? एक  सवाल  के  कारण ! 

जी  हाँएक सवाल के कारण! घबराइए  नहीं सवाल ये  नहीं है कि


अकबर  का  बाप  कौन  था (जैसा  की KBC-4 के प्रोमो  में 


आजकल  पूछा   जा रहा है). वैसे  अकबर का बाप वाकई  में था


कौनजहाँ  जाओ  लोगों  के होठों  पर  बस  यही  सवाल होता 


है-----आज कल क्या  कर  रहे  हो बेटा ?”  


समझ  में नहीं आता की क्या जवाब  दूं  लोगों को ?

 इसलिए  जब  भी  कोई  मुझसे  ये  खतरनाक  सवाल  पूछता 


है  तो  बस  चेहरे  पे  एक  हल्की  मुस्कान  लिए  नज़रें 



झुकाता  हुआ  निकल  लेता  हूँ . अब  अगर  मेरी  शादी  की  


बात  कर  रहे  होते  तो मेरी इस  हरकत  पर  लोग  शरमा


गया , शरमा गया . लड़का  शरमा गया.कहकर  हँसते  हुए आगे  बढ़  जाते .


वेळ , मुस्कान तो अभी  भी लोगों  के  चेहरे पर देखने  को 


मिल  ही  जाती  है. पर ये मुस्कान कटाक्ष  वाली  होती  है . 


इग्नू  के  M.A. इन  जर्नलिज्म    कोर्स  में  एडमिशन  होने 


के  बाद  भी  उसमे  एडमिशन ना  लेने   के मेरे  निर्णय  के 


बाद(क्यूंकि मैं फिल्म एंड टेलीविजन इन्स्चीतीउट ऑफ इंडिया के 


स्क्रिप्ट राइटिंग वाले कोर्स में एक बार कोशिश करना चाहता था 


अगले साल और अगर मैं इग्नू वाले कोर्स में एडमिशन ले लेता तो 


ये संभव नहीं था.), तो ये मुस्कान और भी ज्यादा  कटीली  हो  गयी  है.

ऐसा  नहीं है की मेरे पास  कोई जवाब  नहीं है. पर वो  जवाब


लोगों के पल्ले  नहीं पड़ता .  


अब कोई कोर्स तो कर नहीं रहे हो.कम  से  कम  कोई छोटी 


जॉब  ही देख  लो . ऐसे  बेकार खाली  क्यूँ बैठे हुए हो ? कुछ कर


लो.”  कुछ  ऐसी  राय मुझे  मिला  करती .  पर क्या मतलब है


इस 'कुछ कर लो' और 'खाली क्यूँ बईठे हो' का?'. 


अब कल ही मेरे घर के सदस्य से किसी ने पुछा की भाई चन्दन


यानी की मैं क्या कर रहा हूँ आज कल. तो उनको जवाब मिला---


'कुछ नहीं'. अरे  भाई  बेकार  और खाली बैठे ही कौन  है यहाँ


 मुझे....मुझे  लोगों से जानना  है कि  बेकारऔर खाली  बैठना


का  क्या डेफिनेशन  है उनका ?   मैं रोज  अपनी  कम्युनिकेशन 


और राइटिंग स्किल  पर काम  कर रहा हूँ. फिर  एक नौवेल  भी


लिख  रहा हूँ.

 और जहाँ  तक  जॉब करने  की बात है तो वो मैं कहीं -कहीं 


अप्लाई  भी कर ही रहा हूँ. अब मैं तो सिर्फ  अप्लाई ही कर 


सकता  हूँ ना? और वैसे  भी क्या अपने  स्किल को अपग्रेड  


करना, अपने सपनों  को पाने  की दिशा  में काम करना बेकार 


खाली बैठनाकहलाता  है? 


क्यूँ हम ये नहीं समझते हैं की The process is as important and 


critical as the final result.
जॉब उसे पाने के लिए प्रयास करना;अपने स्किल्स में बढ़ोतरी करना वो 


प्रोसेस है जिससे मैं अभी गुजर रहा हूँ. और ऐसा भी नहीं है की 


मैं कोई पैसे वैसे नहीं कम रहा हूँ.जुलाई महीने तक मैंने एक 


डेवेलपमेंट एजेंसी में बतौर रिपोर्टर और राइटर काम किया है और 


उसके लिए अच्छे-खासे पैसे भी मिले मुझे.फिर क्या प्रॉब्लेम है 


लोगों को? मतलब  कहीं पर बंधुआ  मजदूर  की तरह   मुफ्त  में 


स्लेव की तरह  खटो या फिर कोई भी घटिया प्राइवेट कॉलेज से 


कोई मॅहगा  सा कोर्स कर लो  ये लोगों को मंजूर  है पर  अपने 


आप  में इन्वेस्ट  करो , अपनी कमियों  को दूर  करने में समय  


और मेहनत  लगाओ तो   वो  नागवार  है उन्हें ! आखिर  क्यूँ?

The process is as important and critical as the final result.


अब जब प्रोसेस में ही कमी  रहेगी  तो रिजल्ट कैसे  अचीव  हो 


पाएगा ? मैं नहीं जानता की जिस तरह और जिन चीजों में मैं 


अभी टाइम खर्च कर रहा हूँ, उसका क्या फिउचर  है. पता नहीं की 


कभी मेरी नॉवेल छप पाएगी भी या नहीं? जिसे मैं अपनी स्किल्स 


में इम्प्रूवमेंट समझ रहा हूँ वो वाकई में इम्प्रूवमेंट है या सिर्फ मेरा 


भ्रम या ग़लतफहमी.मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि मैं समय बर्बाद 


नहीं कर रहा है.  पर एक-एक को पकड़  कर  ये बातें कौन  


समझाए ?


इसलिए  काफी  चिंतन  करने  के  बाद  मैं  इस  निष्कर्ष  पर  


पहुंचा  हूँ  कि अब  से  जो  भी  मुझे  ये  सवाल  करेगा कि    
बेटा  आजकल  क्या  कर  रहे  हो ?” तो  मैं उनसे  कहूंगा  की  
अंकल  बस  श्री  कृष्ण  के कहे  रास्ते  पर चल  रहा  हूँ---- 


कर्म  किये जा  रहा हूँ फल  की चिंता  किये बगैर .”. क्यूँ  सही  


जवाब  सोचा  है  ना ?

लेकिन इसमे एक छोटा सा लोच है.


अब कल  को  ही  एक बुजुर्ग  ने  मुझे वो  सवाल कर डाला . 


अब उनको  श्री कृष्णवाला  जवाब देता  तो थोडा  रुड  नहीं  


लगता ? इसलिए मैंने  उनसे कहा  ----कुछ  नहीं दद्दू  बस कल 


को आपके  घर  मिठाई  लाने  की तैयारी  चल रही  है.”.

मिठाई? क्यूँ बेटा?”. उन्होंने  पूछा .


जी  वो नया  घर और  नयी  गाडी  खरीदने  की ख़ुशी  में .मैंने जवाब दिया .


गाडी? घर? वो कब  खरीदा ?” उन्होने  आश्चर्यचकित  होते  हुए  पूछा .


खरीदा नहीं कल को खरीदूंगा .मैंने स्पष्ट  किया .


उनके  चेहरे  पर प्रश्न  ही प्रश्न उभर  आये .


मैंने कहा, “मैं समझाता  हूँ. पहले ये बताइये आप कि मिठाई क्यूँ आपके यहाँ  लाने वाला हूँ?”


घर और गाड़ी खरीदने की ख़ुशी में.उन्होने कहा.


करेक्ट .और गाडी और घर कब खरीदी  जा सकती है?”


अच्छी जॉब लगने पर.


और अच्छी जॉब कैसे लगेगी?” मैंने फिर एक सवाल दागते हुए पूछा.


मेहनत और लगन  से.उन्होने कहा.


बिलकुल सही. सो  आजकल वही  कर रहा हूँ-- मेहनत .मैंने कन्क्लूड  करते  हुए कहा.


वैसे  पता  नहीं इस घटना  का  इस बात  से कोई  लेना  देना  


है की नहीं पर कल ही मैंने सुना  की उनका  अचानक  से BP  


बहुत  हाई  हो गया  और उन्हें   में  भर्ती  करना  पड़ा .


.भगवान् उनकी रक्षा करे.


 बहरहाल , चलो  मेरी  प्रॉब्लम  तो सौल्व  हो गयी! लेकिन  


अगर  यही  सवाल  किसी  ने  मेरे  घरवालों  से  कर  दिया तो  
? अब वो तो नहीं कह  सकते  ना कि  श्री कृष्ण  के  कहे  


रास्ते  पे  चलते  हुए  बस  सिर्फ  कर्म  किये  जा  रहा  है  


हमारा  आज  का  अर्जुन ’.” या  फिर  आपके  घर  कल  


कोमिठाई  लाने  की  तैयारी  में  जुटा  है”.


तो, भैया उनके लिए कौन सा पौलीतिकली करेक्ट जवाब सोचूं. 


हाँ , याद  आया ! 

दशकों  पहले मैंने इग्नू  के डिप्लोमा  इन  क्रिएटिव  राइटिंग  


वाले  कोर्स  में एडमिशन  लिया  था  जिसे  आज तक  मैं पूरा  


नहीं कर पाया  हूँ. अभी  भी मेरे पास  एक और साल का  


टाइम बचा  है  पूरा  करने  को . हाँ  ये  बढियां  रहेगा . 


उनके ये  जवाब  देने  पर  कि   मैं  कोई  कोर्स  कर  रहा  


हूँ लोगों को  भी  चैन   हो जाएंगे  कि  चलो लड़का  खाली  


बेकार नहीं बैठा   है’ 'कुछ कर रहा है'. और मुझे  हीन  दृष्टि  से  


भी  नहीं  देखेंगे .
तो चलो भाई  ये फाइनल  हुआ . अब जब  भी मुझसे  ये कठिन  सवाल  पूछा जाएगा  तो आप ये जवाब सुनने  के लिए तैयार  रहिएगा -----

•     “बस श्री कृष्ण के कहे रास्ते पर चल रहा हूँ------ सिर्फ कर्म कर रहा हूँ फल की चिंता किये बगैर.

•     “आपके घर कल को मिठाई लाने की तैयारी में जुटा हूँ.

•     इग्नू से डिप्लोमा इन क्रिएटिव राइटिंग का कोर्स कर रहा हूँ.



अब  इन तीनों  में से जो  जवाब  पसंद  हो और जो  मेरे 


सबसे  कम बत्तिमिजी या काबिल बनने  जैसी  फीलिंग  देता हो, वो जवाब आप सेलेक्ट  कर लो .
ठीक  है जी? अच्छा  फिर चलता  हूँ. 


कर्मकरने  का टाइम  हो चला  है.


मिलता  हूँ फिर बाद में.


जय  श्री कृष्ण!


Friday, May 1, 2009

An epitaph of myself---'मेरी मौत पर लिखा गया एक स्मरण लेख'

गीता में कहा गया है की जहाँ अच्छाई होती है वहाँ बुराई भी होती है. यानी जहाँ जहाँ एक कृष्ण होता है वहां वहां एक कंस मामा का होना भी अवश्यम्भावी है. ऐसे ही एक कंस का प्रतिक थे चन्दन जो अब हमारे बीच नहीं रहे. चन्दन जी को अगर एक शब्द में बयान करना हो तो वो शब्द होगा 'अलग'.


चन्दन वाकई में बहुत ही अलग थे. अभी मैंने उनकी तुलना कंस से की. पर उस कंस और इस कलियुगी कंस में उतना ही अंतर है जितना की लालू जी का चुनाव से पहले कॉंग्रेस के साथ रिश्ता और चुनाव के बाद का रिश्ता. यानी की टोटल कॉन्ट्रास्ट.


चन्दन जी ओरिजिनल कंस की तरह किसी के मामा तो नहीं थे पर हाँ अपने जीवनकाल में कई लोगों को उन्होने अपनी चारसौबीसी नेचर के कारण 'मामा' जरूर बनाया. दूसरा अंतर ये है की इन्होने ओरिजिनल कंस की तरह देवकी के सात शिशुओँ का वध तो नहीं किया पर सात बच्चों के पिता बनकर ओरिजिनल कंस के कारनामों की भरपाई जरूर करने की कोशिश की.


अपने जीवनकाल में चन्दन जी नि ये सफल कोशिश की इनके किसी भी चिर-परिचित से मुस्कान ऐसे गायब हो जैसे की IPL kii KKR team के मालिक शाह रुख खान के चेहरे से हंसी और ज़िन्दगी से ख़ुशी गायब हो गयी हो.


आज चन्दन जी हमारे बीच नहीं हैं. इनके जाने से आंसुओँ की धारा बह निकली है सभी आंखों से.इसे देखते हुए 'opportunist' THIRD FRONT ने हमेशा की तरह डांस पे चांस मारा और चन्दन जी के घर के बाहर make-shift tissue paper की एक दूकान लगा कर बैठ गए हैं. भगवान् भला करे ऐसा 'मौकापरस्तों' का.
आज हर जगह recession, slowdown मंदी की चर्चा जोरों पर है. पर ये तो पिछले १०-१२ महीनों में ही ऐसा हर जगह देखने-सुनने को मिल रहा है. चन्दन जी की फेमिली तो पिछले कई सालों से cost-cutting, recession, मंदी जैसे चीजों से दो-चार होती आ रही हैं चन्दन जी की कंजूस प्रवित्ति के कारण.
पर आज चन्दन जी ने अपनी मौत से मंदी के भूत को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया ठीक उसी तरह जिस तरह IPL को साउथ-अफ्रीका का रास्ता दिखाया गया था। पर चलो मंदी के भूत से पिंड तो छुटा.
क्या हुआ की अभी इसकी beneficiary सिर्फ उनकी फेमिली हो होगी. किसी को तो अब मंदी के मार नहीं झेलनी पड़ेगी और वे अब खुल के अपनी चाहतें पूरी कर सकेंगे.


भगवान् चन्दन जी की आत्मा को शान्ति,कमला,पूजा,ऋतू,श्रेया, रितिका और जिसे भी वोह अपने जीवनकाल में चाहते थे, वो इनको मिले.

Thursday, April 30, 2009

A TV AD ON THE ELECTION THEME

[scene: एक मिडिल-एज आदमी(मिस्टर मेहता)अपने घर की रिपेयर, रंगाई-पुताई करवा रहा होता है।)]। (This is an ad written n conceptualised by me and is an original work)

VO1 : क्यूँ मेहता साहब किसकी सरकार बनती देख रहे हैं इस बार? इस बार आपका वोट किसे पडेगा?

VO 2(Mr। Mehta): अरे भाई किसे फुर्सत है? अभी घर में काम लगा रखा है। वोटिंग के लिए जा पाना मुश्किल है।

VO1 : अरे मेहता साहब ज्यादा से ज्यादा आधा दिन लगेगा। कुछ घंटे का समय निकाल के चल जाइयेगा वोटिंग करने।

VO 2(Mr। Mehta):कुछ घंटे? अरे यहाँ तो पांच-मिनट की फुर्सत नहीं है। अब अपने घर का काम है। लगे रहना पड़ता है। वरना थोडी सी भी ढिलाई देने का मतलब हजारों का खर्चा और। यहाँ तोह सर पर सवार होकर काम करवाना पड़ता है।

VO1 : अरे तो उतनी देर के लिए किसी और को काम देखने पर लगा दीजिये और आप वोट दे आइये।

VO 2(Mr। Mehta): क्या बात कर रहे हैं भाई? मेरा मकान है तो जवाबदेही भी मेरी ही बनती है इसके देख-रेख की।इस बात की क्या गारंटी है की दूसरा उतने ही sincerity से ये काम देखेगा जितनी sincerity से मैं देखता हूँ। ऐसे कैसे मैं किसी भी के हाथों में अपने घर को सौंप दूँ? अपने घर के मामले में मैं ऐसी लापरवाही नहीं बरत सकता।

VO 1: मेहता जी देश भी तो अपना ही है और इसके देख-रेख की भी तो जिम्मेदारी हमारी ही है। ऐसे कैसे किसी के भी हाथों हम अपने देश को सौंप सकते हैं? अगर हम नहीं सोचंगे तो और कौन सोचेगा।

BACKGROUND VOICE OVER: जब कुछ घंटों के लिए हम अपना घर किसी और के हवाले नहीं कर सकते तो कैसे अपने देश को बिना सोचे-समझे किसी के भी हवाले कर सकते हैं? वोटिंग करने जरूर जाएं तो एक अच्छे और सच्चे नेता को चुन कर अपने देश को भी सुन्दर और मजबूत नींव प्रदान करें।
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